Haritalika teej Vrat Katha
Budhvaar vrat Katha
Ravivar Vrat Katha
Guruvar Vrat Katha
Shanivar Vrat Katha
Pradosh Vrat Katha
Narsingh jayanti Vrat Katha
Maha shivratri Vrat Katha
Mangalvar Vrat Katha
Somvar Vrat Katha
Sharad poornima Vrat Katha
Shukravar Vrat Katha
Bhai dooj katha
Rishi Panchmi Vrat Katha
Santan Saptami Vrat Katha
Maha Laxmi Vrat Katha

**Maha Laxmi Vrat Katha **


महालक्ष्मी व्रत की पूजा विधी (Mahalaxmi vrat Pooja Vidhi):

इस व्रत को करते वक़्त सर्वप्रथम व्रत के दिन सूर्योदय के समय स्नान आदि करके पूजा का संकल्प किया जाता है। पूजन के संकल्प और स्नान के पहले इस दिन दूर्वा को अपने शरीर पर घिसा जाता है।संकल्प लेते समय व्रत करने वाली महिला अपने मन मे यह निश्चय करती है कि माता लक्ष्मी मै आपका यह व्रत पूरे विधी विधान से पूरा करूंगी। मै इस व्रत के हर नियम का पालन करूंगी। वो कहती है कि माता लक्ष्मी मुझ पर कृपा करे, कि मेरा यह व्रत बिना किसी विघ्न के पूर्ण हो जाए। इस संकल्प के बाद एक सफेद डोरे मे 16 गठान लगाकर उसे हल्दी से पीला किया जाता है और फिर उसे व्रत करने वाली महिला द्वारा अपनी कलाई पर बांधा जाता है.अब पूजन के वक़्त एक पटे पर रेशमी कपड़ा बिछाया जाता है। इस वस्त्र पर लाल रंग से सजी लक्ष्मी माता की तस्वीर और गणेश जी की मूर्ति रखी जाती है । कुछ लोग इस दिन मिट्टी से बने हाथी की पूजा भी करते है। अब मूर्ति के सामने पानी से भरा कलश स्थापित करते है और इस कलश पर अखंड ज्योत प्रज्वलित करते है। अब इसकी पूजा सुबह और शाम के वक़्त की जाती है। और मेवे तथा मिठाई का भोग लगाया जाता है।

पूजन के प्रथम दिन लाल नाड़े मे 16 गाठ लगाकर इसे घर के हर सदस्य के हाथ मे बांधा जाता है और पूजन के बाद इसे लक्ष्मी जी के चरणों मे चढ़ाया जाता है। व्रत के बाद ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है और दान दक्षिणा दी जाती है। इस सब के बाद लक्ष्मी जी से व्रत के फल प्राप्ति की प्रार्थना की जाती है।महालक्ष्मी व्रत की कथा (Mahalaxmi vrat Katha):

इस व्रत के संदर्भ मे कई कथाये प्रचलित है यहा हम आपको 2 कथाये बता रहे है।
प्रथम कथा:

एक बार हस्तिनापूर मे महालक्ष्मी व्रत के दिन गांधारी ने नगर की सारी स्त्रियो को पूजन के लिए आमंत्रित किया, परंतु उसने कुंती को आमंत्रण नहीं दिया। गांधारी के सभी पुत्रो ने पूजन के लिए अपनी माता को मिट्टी लाकर दी और इसी मिट्टी से एक विशाल हाथी का निर्माण किया गया और उसे महल के बीच मे स्थापित किया गया। नगर की सारी स्त्रीया जब पूजन के लिए जाने लगी, तो कुंती उदास हो गयी। जब कुंती के पुत्रो ने उसकी उदासी का कारण पूछा तो उसने सारी बात बताई। इस पर अर्जुन ने कहा माता आप पूजन की तैयारी कीजिये मै आपके लिए हाथी लेकर आता हूँ। ऐसा कहकर अर्जुन इन्द्र के पास गया और अपनी माता के पूजन के लिए ऐरावत को ले आया। इसके बाद कुंती ने सारे विधी विधान से पूजन किया और जब नगर की अन्य स्त्रियो को पता चला, कि कुंती के यहा इन्द्र के ऐरावत आया है| तो वे भी पूजन के लिए उमड़ पड़ी और सभी ने सविधि पूजन सम्पन्न किया।
द्वतीय कथा

एक गाव मे एक ब्राह्मण रहता था। वह ब्राह्मण नियमानुसार भगवान विष्णु का पूजन प्रतिदिन करता था। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे दर्शन दिये और इच्छा अनुसार वरदान देने का वचन दिया। ब्राह्मण ने माता लक्ष्मी का वास अपने घर मे होने का वरदान मांगा। ब्राह्मण के ऐसा कहने पर भगवान विष्णु ने कहा यहा मंदिर मे रोज एक स्त्री आती है और वह यहा गोबर के उपले थापति है। वही माता लक्ष्मी है। तुम उन्हे अपने घर मे आमंत्रित करो। देवी लक्ष्मी के चरण तुम्हारे घर मे पड़ने से तुम्हारा घर धन धान्य से भर जाएगा। ऐसा कहकर भगवान विष्णु अदृश्य हो गए। अब दूसरे दिन सुबह से ही ब्राह्मण देवी लक्ष्मी के इंतजार मे मंदिर के सामने बैठ गया। जब उसने लक्ष्मी जी को गोबर के उपले थापते हुये देखा तो उसने उन्हे अपने घर पधारने का आग्रह किया। ब्राह्मण की बात सुनकर लक्ष्मी जी समझ गयी की यह बात ब्राह्मण को विष्णु जी ने ही कही है। तो उन्होने ब्राह्मण को महालक्ष्मी व्रत करने की सलाह दी । लक्ष्मी जी ने ब्राह्मण से कहा कि तुम 16 दिनो तक महालक्ष्मी व्रत करो और व्रत के आखिरी दिन चंद्रमा का पूजन करके अर्ध्य देने से तुम्हारा व्रत पूर्ण होगा।ब्राह्मण ने भी महालक्ष्मी के कहे अनुसार व्रत किया और देवी लक्ष्मी ने भी उसकी मनोकामना पूर्ण की। उसी दिन से यह व्रत श्रद्धा से किया जाता है.


सोलह बोल


अमोती दमो तीरानी ,पोला पर ऊचो सो परपाटन गाँव जहाँ के राजा मगर सेन दमयंती रानी.कहे कहानी .सुनो हो महालक्ष्मी देवी रानी ,हम से कहते तुम से सुनते सोलह बोल की कहानी



इस व्रत पर सोलह बोल की कहानी सोलह बार कही जाती है और चावल या गेहूँ छोडे जाते है l आश्विन कृष्णा अष्टमी को सोलह पकवान पकाये जाते है l