Haritalika teej Vrat Katha
Budhvaar vrat Katha
Ravivar Vrat Katha
Guruvar Vrat Katha
Shanivar Vrat Katha
Pradosh Vrat Katha
Narsingh jayanti Vrat Katha
Maha shivratri Vrat Katha
Mangalvar Vrat Katha
Somvar Vrat Katha
Sharad poornima Vrat Katha
Shukravar Vrat Katha
Bhai dooj katha
Rishi Panchmi Vrat Katha
Santan Saptami Vrat Katha
Maha Laxmi Vrat Katha

**Santan Saptami Vrat Katha **


सप्तमी व्रत विधि :-



सप्तमी का व्रत माताओं के द्वारा किया अपनी संतान के लिये किया जाता है इस व्रत को करने वाली माता को प्रात:काल में स्नान और नित्यक्रम क्रियाओं से निवृ्त होकर, स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए. इसके बाद प्रात काल में श्री विष्णु और भगवान शिव की पूजा अर्चना करनी चाहिए. और सप्तमी व्रत का संकल्प लेना चाहिए.सप्तमी का व्रत माताओं के द्वारा किया अपनी संतान के लिये किया जाता है इस व्रत को करने वाली माता को प्रात:काल में स्नान और नित्यक्रम क्रियाओं से निवृ्त होकर, स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए. इसके बाद प्रात काल में श्री विष्णु और भगवान शिव की पूजा अर्चना करनी चाहिए. और सप्तमी व्रत का संकल्प लेना चाहिए.


निराहार व्रत कर, दोपहर को चौक पूरकर चंदन, अक्षत, धूप, दीप, नैवेध, सुपारी तथा नारियल आदि से फिर से शिव- पार्वती की पूजा करनी चाहिए.सप्तमी तिथि के व्रत में नैवेद्ध के रुप में खीर-पूरी तथा गुड के पुए बनाये जाते है. संतान की रक्षा की कामना करते हुए भगवान भोलेनाथ को कलावा अर्पित किया जाता है तथा बाद में इसे स्वयं धारण कर इस व्रत की कथा सुननी चाहिए.

संतान सप्तमी व्रत कथा :

पूजा के बाद कथा सुनने का महत्व सभी हिन्दू व्रत में मिलता हैं | Santan Saptami Ki Katha पति पत्नी साथ मिलकर सुने तो अधिक प्रभावशाली माना जाता हैं |



इस व्रत का उल्लेख श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर के सामने किया था | उन्होंने बताया यह व्रत करने का महत्व लोमेश ऋषि ने उनके माता पिता (देवकी वसुदेव) को बताया था | माता देवकी के पुत्रो को कंस ने मार दिया था जिस कारण माता पिता के जीवन पर संतान शौक का भार था जिससे उभरने के लिए उन्हें संतान सप्तमी (Santan Saptami ) व्रत करने कहा गया |
लोमेश ऋषि ने इस व्रत के सन्दर्भ में एक कथा सुनाई जो इस प्रकार हैं :

अयोध्या का राजा था नहुष उसकी पत्नी का नाम चन्द्र मुखी था | चन्द्र मुखी की एक सहेली थी जिसका नाम रूपमती थी वो नगर के ब्राह्मण की पत्नी थी | दोनों ही सखियों में बहुत प्रेम था | एक बार वे दोनों सरयू नदी के तट पर स्नान करने गयी वहाँ बहुत सी स्त्रियाँ संतान सप्तमी ( Santan Saptami ) का व्रत कर रही थी | उसकी कथा सुनकर इन दोनों सखियों ने भी पुत्र प्रप्ति के लिए इस व्रत को करने का निश्चय किया लेकिन घर आकर वे दोनों भूल गई | कुछ समय बाद दोनों की मृत्यु हो गई और दोनों ने पशु योनी में जन्म लिया |

कई जन्मो के बाद दोनों ने मनुष्य योनी में जन्म लिया इस जन्म में चन्द्रवती का नाम ईश्वरी एवम रूपमती का नाम भूषणा था | इश्वरी राजा की पत्नी एवं भुषणा ब्राह्मण की पत्नी थी इस जन्म में भी दोनों में बहुत प्रेम था | इस जन्म में भूषणा को पूर्व जन्म की कथा याद थी इसलिए उसने संतान सप्तमी (Santan Saptami ) का व्रत किया जिसके प्रताप से उसे आठ पुत्र प्राप्त हुए लेकिन ईश्वरी ने इस व्रत का पालन नहीं किया इसलिए उसकी कोई संतान नहीं थी | इस कारण उसे भूषणा ने इर्षा होने लगी थी | उसने कई प्रकार से भुषणा के पुत्रों को मारने की कोशिश की लेकिन उसके भुषणा के व्रत के प्रभाव से उसके पुत्रो को कोई क्षति ना पहुँची | थक हार कर ईश्वरी ने अपनी इर्षा एवं अपने कृत्य के बारे में भुषणा से कहा और क्षमा भी माँगी | तब भुषणा ने उसे पूर्वजन्म की बात याद दिलाई और संतान सप्तमी के व्रत को करने की सलाह दी | ईश्वरी ने पुरे विधि विधान के साथ व्रत किया और उसे एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई |

इस प्रकार संतान सप्तमी (Santan Saptami ) के व्रत का महत्व जानकर सभी मनुष्य पुत्र प्राप्ति एवं उनकी सुरक्षा के उद्देश्य से इर व्रत का पालन करते हैं |