Haritalika teej Vrat Katha
Budhvaar vrat Katha
Ravivar Vrat Katha
Guruvar Vrat Katha
Shanivar Vrat Katha
Pradosh Vrat Katha
Narsingh jayanti Vrat Katha
Maha shivratri Vrat Katha
Mangalvar Vrat Katha
Somvar Vrat Katha
Sharad poornima Vrat Katha
Shukravar Vrat Katha
Bhai dooj katha
Rishi Panchmi Vrat Katha
Santan Saptami Vrat Katha
Maha Laxmi Vrat Katha

**Rishi Panchmi Vrat Katha **


इस दिन प्रायः लोग दही और साठी का चावल खाते हैं ! खेत से जुते हुए अन्न का सेवन भी वर्जित हैं! दिन में एक बार ही भोजन का विधान हैं !
कलश आदि पूजन सामग्री को ब्राह्मण भोजन कराकर प्रसाद पाना चाहिए !

सप्त ऋषि

१ - कश्यपाय नमः
२ - अत्रये नमः
३ - भारद्वाजाय नमः
४ - विश्वामित्राय नमः
५ - गौतमाय नमः
६ - जम्दग्नये नमः
७ - वाशिष्ठाये नमः
अंत में अरुन्धत्ये नमः करके पूजन संपन्न करना चाहिए !
कथा शास्त्रानुसार

राजा सिताश्व ने ब्रह्मा जी से पूछा - हे देव देवेश मैंने आपके मुख से बहुत से व्रत सुने ! अब मेरे मन में किसी एक पाप विनाशक वर्त के बारे में जानने की अभिलाषा हैं ! कृपा करके आप उस व्रत को कहे !

ब्रह्मा जी ने कहा - राजन में उस व्रत को कहता हूँ जो समस्त पापों का विनाशक हैं ! राजन उस व्रत का नाम ऋषि पंचमी व्रत हैं !

इसी प्रसंग में महात्मा लोग पुरानी बात कहा करते हैं कि विदर्भ देश की राजधानी में उत्तंग नामक एक ब्राहमण रहता था ! उसकी सुशीला नाम की भार्या ( पत्नी ) थी वह पति सेवा में पारायण थी !
सुशीला के गर्भ से दो संताने उत्पन्न हुई एक पुत्र और दूसरी पुत्री थी !

पुत्र सर्वगुण संपन्न था, उसने वेड धर्म आदि का अच्छा अध्ययन किया था !
उत्तंग ब्राह्मण ने अपनी कन्या का विवाह अच्छे कुल में कर दिया ! पर हे राजन प्रारब्ध योग से वह कन्या विधवा हो गई ! पतिव्रता धर्म का पालन करते हुए वह कन्या अपने पिता के घर आकर समय व्यतीत करने लगी !
उत्तंग ब्राहमण इस दुःख से दुखी हो अपने पुत्र को घर पर छोड़, अपने पत्नी तथा पुत्री के साथ गंगा जी के तट पर जाकर निवास करने लगा !
वहां जाकर अपने शिष्यों को वेद और अध्ययन कराने लगा !
वह लड़की अपने पिता की सेवाश्रुषा करने लगी !
एक दिन वह लड़की अपने पिता की सेवा करते-करते थक गई और तब वह एक पत्थर पर जाकर सो गई ! शयन करते ही उसके शरीर में कीड़े लग गए और सारा शरीर कृमिमय हो गया !


गुरु पुत्री की ऐसी दशा देखकर एक शिष्य बहुत ही दुखी होकर गुरु पत्नी के पास जाकर निवेदन कर कहा - हे माते - हम कुछ नहीं जानते आपके उस सत चरित्र वाली आपकी पुत्री को क्या हो गया हैं ! उनकी ऐसी दशा क्यों कर हो गई हैं ? आज उनका शरीर दिखाई नहीं देता ! मात्र कृमिया ही कृमिया दिखाई दे रही हैं !
माँ को ये वचन वज्राघात से लगे ! माँ तुरंत अपनी पुत्री के समीप गई, पुत्री की ऐसी अवस्था को देख कर विलाप करने लगी !

छाती पर हाथ पीटती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी और मूर्क्षित हो गई !
कुछ देर बाद होश आया तो, अपनी पुत्री को आँचल से पोछती हुई, अपने कंधे का सहारा देती हुई उसके पिता के पास ले आई और बोली - हे स्वामी देखिये - यह अर्ध रात्रि का समय हैं और यह सो रही थी ! सोते समय इसके शरीर में कीड़े पड़ गए !

ब्राहमण समाधिस्थ हो उस लड़की के पूर्व जन्म के पापों को देखकर बोले - हे प्रिये यह पूर्व जन्म में ब्राह्मणी थी, उस जन्म में रजस्वला होकर भोजन आदि के पात्रों को स्पर्श आदि का विचार नहीं किया सभी को हाथ लगा दिया ! उसी पाप कर्मन के कारण इसका शरीर कीड़ों से ढक गया हैं!
हे प्रिये - रजस्वला के समय स्त्री पापिन होती हैं ! पहले दिन चाण्डालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी, तीसरे दिन धोबिन, चौथे दिन शुद्ध होती हैं ! उसी जन्म में अपने सखियों के दुह्संग से ऋषि पंचमी व्रत को देखकर भी उसका अपमान कर दिया था !

दर्शन के प्रभाव वश इसे पुनः ब्राहमण कुल में जन्म मिला हैं !
ला ने कहा हे स्वामी ऐसे प्रभावी व्रत को हमें भी बताइए, जिसके करने से महान पुन्य की प्राप्ति होती हैं !

ऋषि ब्राहमण ने कहा - देवी ध्यान लगाकर सुने - यह व्रत तीनों प्रकार के पापों का नाश करने वाला हैं, स्त्रियों को सौभाग्य प्रदान करने वाला हैं और धन समपत्त प्रदान करने वाला हैं, इस व्रत में संदेह नहीं करना चाहिए !
व्रत सम्पूर्ण विधि
देवी भाद्र पद शुक्ल पक्ष की पंचमी को किसी जलाशय में जाकर अपामार्ग का दातून कर मिटटी के लेप से स्नान कर व्रत नियम को धारण करना चाहिए ! ततपश्चात् सप्त् ऋषियों का शास्त्रोक्त पद्धति के आधार पर पूजन करना चाहिए !
ऋषियों को सुन्दर अधोवस्त्र, यज्ञोपवीत, उपवस्त्र, से अलंकृत करना चाहिए ! अच्छे फल नैवेद्य लेकर इनके साथ अर्ध्यदान करना चाहिए !
उस समय सप्त ऋषियों
१ - कश्यपाय नमः
२ - अत्रये नमः
३ - भारद्वाजाय नमः
४ - विश्वामित्राय नमः
५ - गौतमाय नमः
६ - जम्दग्नये नमः
७ - वाशिष्ठाये नमः
को नमस्कार कर अर्ध्य दान कर बोले - हे ऋषि गण कृपया मेरा अर्ध्य दान स्वीकार करे ! और प्रसन्न हो !
अंत में अरुन्धत्ये नमः करके पूजन संपन्न करना चाहिए !
इस व्रत में शाग का भोजन करना चाहिए ! सभी तीर्थो में स्नान आदि से जो फल प्राप्त होता हैं वह सभी इस एक मात्र व्रत के प्रभाव से मिल जाते हैं !
जो इस व्रत को करते हैं वे सुख सम्पनं , रूप गुण संपन्न , पूर्ण काया से युक्त , एवं पुत्र पुत्रादि आदि गुणों से भी सदा ही सम्पन्न रहते हैं ! इस लोक के सभी भोगो को भोग कर परलोक में बैकुंठ की प्राप्ति होती हैं !